Description
“कहते-कहते रुक जाना मेरा, तुझे जाता देख न रोक पाना मेरा, हर रोज़ रसोई में साथ काम करते हुए तुझे न समझ पाना मेरा, कहूँ न कहूँ—यह सोचते घंटों नि नि काल देना मेरा… कहते-कहते रुक जाना मेरा।”मैं अक्सर बेफ़ि फ़ि ज़ ूल की बातों में तो फंसकर रह जाती हूँ, लेकि कि न जो बातें सच में ज़ रूरी होती हैं — जैसे प्रेम की बातें जो कह देनी चाहि हि ए, मैं वही नहीं कह पाती। पता नहीं मुझे क्या हो जाता है, मैं हमेशा चुप रह जाती हूँ। बातें करना, अपनी राय देना, हँसी-मज़ ाक करना मेरे लि लि ए हमेशा सहज रहा है। मुझे कभी तकलीफ़ नहीं हुई नए दोस्त बनाने में या कि कि सी से खुद बात करने में; न ही मैं महफ़ि फ़ि लों में मौन रहने वालों में से हूँ। मैं खुलकर जीती हूँ।
लेकिन जब बात प्रेम की आती है, इज़ हार की होती है, या अपने हक़ की होती है जि जि न बातों को कह देना चाहि हि ए, जता देना चाहि हि ए उन बातों में मैं पीछे रह जाती हूँ। कभी-कभार सि सि र्फ र्फ मन की बात कह देने से उलझा हुआ रि रि श्ता सुलझ सकता है; बस एक प्यार भरी पुकार कि कि सी जाते हुए शख़्स को लौटाने के लि लि ए काफ़ ी होती है, लेकि कि न ऐसी आवाज़ ें मेरी ज़ ुबान तक नहीं आ पातीं। वह एक सच जो हो रहे अन्याय को रोक सकता था, अक्सर मेरे भीतर ही कहीं दम तोड़ देता है। ऐसी कई बातों को न कह पाने का अफ़ सोस मेरे अंदर उफान मारता है, हृदय कुंठि ठि त हो जाता है और क्रोध आँखों से आँसू बनकर बहने लगता है।
यह कवि वि ता संग्रह उन्हीं अधूरे संवादों का समावेश है जि जि न्हें मैं कभी पूरा नहीं कर पाई। अपने बहते नयनों और उबलते जज़्बातों को शांत करने के लि लि ए मैंने कलम का सहारा लि लि या है और लेती रहूँगी। क्योंकि कि कुछ बातें, चाहकर भी मैं कभी पूरी नहीं कर सकूँगी।



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